[अमित आलोक], पटना। करीब 138 वर्ष पूर्व शाहमल्ली व सोलोवाही नाम के युवक-युवती बिहार के आरा जिले से ब्रिटिश गुयाना गए थे। बाद में उन्होंने विवाह कर वहीं अपनी दुनिया बसा ली। आज उनकी चौथी पीढ़ी के रियाद हमीद अपने
पुरखों की खोज में जुटे हैं।

इसी तरह 1858 में रोजी-रोटी की तलाश में मारीशस गए अपने पूर्वजों की जड़ों को फैजुल डुलुल तलाश रहे हैं। प्रभाकर बकी को सिर्फ इतना पता है कि उनके पुरखे शाहजहां नामक किसी जहाज से मारीशस रवाना हुए थे। बिहार की माटी
में अपनी जड़ें तलाश रहे लोगों का माध्यम बनी है वेबसाइट ब्राड बिहार डाट
काम। सूबे के गाव-गाव का परिचय देती इस साइट का उपयोग देश-विदेश के लोग
बिहार को जानने-समझने में कर रहे हैं। यह वेबसाइट इस क्रम में लापता बच्चों
की तलाश का एक प्लेटफार्म भी बनकर उभरी है। ऐसे हुआ एक सपने का जन्म बिहार
के तीन युवकों उत्पल कुमार, प्रभात कुमार व सौरभ कुमार ने 2003 में सूबे
को एक ब्राड के रूप में विश्‌र्र्व पटल पर रखने की ठानी। तब मुंबई में रह
रहे उत्पल व प्रभात वहा बिहारियों के साथ आए दिन हो रहे दु‌र्व्यवहार व
बिहार को लेकर भ्रातियों से व्यथित थे। उन्हें लगा कि राच्य का सही चित्र
दिखाए बिना बिहारियों को प्रतिष्ठा नहीं मिलने वाली है।

उन्होंने ब्राड बिहार डाट काम का सपना देखा। वेबसाइट के लिए जनसंपर्क का दायित्व संभाल रहे उत्पल के अनुसार 2006 में इसे आफलाइन लाच किया गया। फिर 2 अप्रैल, 2008 को इसे आनलाइन कर दिया गया। अपने दम पर तय की मंजिलें
2003 में साधारण सी शुरुआत के साथ आरंभ सफर आज एक मुकाम पर है। इस दौरान
अनेक कठिन दौर आए, लेकिन हौसले बुलंद थे, सो रास्ते बनते चले गए। उत्पल
बताते हैं कि जो भी कमाया था, इस अभियान में लगा दिया। बिहार में गाव-गाव
घूमकर नेटवर्क बनाया, आकड़े व सूचनाएं इकट्ठा कर वेबसाइट को समृद्ध किया। यह
काम अभी भी जारी है। उनके अनुसार इस प्रयास के दौरान सरकार व प्रशासन से
कोई सहयोग नहीं मागा। सूचनाओं का समृद्ध भंडार ब्राड बिहार डाट काम आज
बिहार के इतिहास, भूगोल, समाज, राजनीति, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की
जानकारियों का समृद्ध भंडार है। इसमें महत्वपूर्ण लोगों व जनप्रतिनिधियों
की भी जानकारी दी गई है।

सूबे के गाव व गली स्तर तक की जानकारी से भरी इस वेबसाइट को हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच, चीनी, जापानी व इटालियन सहित दुनिया की 14 भाषाओं में देखा जा सकता है। इस पर रामचरितमानस व वेद तथा अनेक बौद्ध व जैन ग्रंथ
आनलाइन किए जा चुके हैं। अन्य धर्म ग्रंथों को भी आनलाइन करने की प्रक्रिया
जारी है।


विश्वभर में रोजाना सवा दो लाख विजिट

ब्राड बिहार डाट काम आज देश-विदेश में कितना लोकप्रिय है, यह इसी से समझा जा सकता है कि इसे दुनिया भर में प्रतिदिन सवा दो लाख लोग विजिट कर रहे हैं। गूगल के आकड़ों के अनुसार 24 मई, 2010 तक इसपर 2.52 करोड़ पृष्ठ
पढ़े जा चुके थे। गूगल के ही अनुसार दुनिया के 189 देशों में ब्राड बिहार
डाट काम देखा जा चुका है।

बिहार में जड़े तलाश रहे विदेशी वेबसाइट पर बिहार की विस्तृत जानकारी को देखते हुए मारीशस, ब्रिटिश गुयाना, ट्रिनिडाड व टोबैगो सहित अनेक देशों के नागरिकों ने अपने पुरखों की जड़ें खोजने के लिए इसे एक माध्यम बनाया है।
वेबसाइट के उत्पल के अनुसार रियाद हमीद, प्रभाकर बकी व फजुल डुलुल तो
उदाहरण मात्र हैं। रोजाना ऐसे लोगों के ई-मेल आते रहते हैं। वेबसाइट की टीम
उन्हें हर संभव मदद देती है। लापता बच्चों की खोज में सहायक वेबसाइट अपनी
लोकप्रियता के कारण गायब हो गये बच्चों की खोज का एक प्लेटफार्म भी बन गया
है। अनेक संस्थाएं इस काम के लिए उनसे संपर्क कर रही हैं। पटना के अनाथालय
अपना घर के अधीक्षक परमानंद चौधरी ने भी वहा के 56 बच्चों के घरों को
ढ़ूंढने में इसकी मदद मागी है। उत्पल बताते हैं कि फरवरी, 2010 में दिल्ली
से गुम हुए नवादा जिला के बच्चे के पिता जगदीश यादव को गाव गंगापुर में
वेबसाइट की मदद से ही खोजा गया था। अभी भी इस साइट पर कुछ लापता बच्चों के
फोटो लगे हुए हैं। इनमें लखनऊ के चारबाग स्टेशन से लापता हुए दिवा व शिवा
नामक बच्चों के फोटो भी हैं, जो इन दिनों पटना के दीघा क्षेत्र में
सुरक्षित रखे बताए जाते हैं।

कार्य शेष, सफर जारी

ब्राड बिहार की टीम अपने इस अभियान की प्रगति की रफ्तार से संतुष्ट तो है, लेकिन बकौल उत्पल, अभी बहुत कुछ करना शेष है। सफर जारी है।

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