क्या जाने तुझसे दूर हूँ या तेरे पास हूँ मैं
मगर ऐ दोस्त आज बहुत उदास हूँ मैं
जिसे देखकर सीखी थी हमने आशिक़ी
जो दे गया मुझे अंदाज़-ए-मौशीकी
जिसे देखकर मिलती थीं ताजगी
जिसके हर अदा में थी बला की सादगी
अब वो नहीं रहा उसकी यादें रह गई
उसकी वो दिलकश दिल अफरोज़ बातें रह गई
वो सलीका-ए-उल्फ़त सिखा गया हमको
ख़ुशी और ग़म की वो सौगातें रह गई
बेपनाह मोहब्बत बख्शी जिसे सारे ज़हां ने
जिसके लिये हसीनाये दीवानी हुई जाती थीं
जिसके दर्द से से ज़र्द हो जाती थी आँखें ज़हां की
उसके लिये हवा-ओ-फ़ज़ा भी दीवानी हुई जाती थी
ग़म को भुलाकर जीना थी आदत उसकी
वो सारे ग़मों से क्यूँकर बेगाना था
मुस्कराहट से था प्यार उसको इस कदर
नाम - ए - अश्क से वो यूँ बेगाना था
मौत का नहीं था खौफ़ उसे ज़िन्दगी से यों मुहब्बत थी
ज़िन्दगी लम्बी नहीं बड़ी होनी चाहिए कहता था वो
ऊपर आका नीचे काका कहती थी दुनियाँ सारी
कुछ यों हिंदुस्तान के दिलों में रहता था वो
कैसे भुला दूँ एक पल में वो सारी बातें
कैसे मिटा दूँ ज़हन से वो सारी यादें
क्या जाने तुझसे दूर हूँ या तेरे पास हूँ मैं
मगर ऐ दोस्त आज बहुत उदास हूँ मैं
Jindagi toh uska hai jo ekdin lelega.
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