बिहार के विकास की दो तसवीर


1. बिहार की राजनीति में जड़ जमा चुकी जातिगत राजनीति की बुनियाद में एक बड़ा परिवर्तन हुआ है.

2. राज्य की तसवीर में विकास की बयार को निचले स्तर से जोड़ने की कोशिश की जा रही है.


3. बिहार सरकार ने विनिर्माण उद्योग के क्षेत्र में लगभग 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हासिल की है.

पिछले पांच सालों में बिहार के विकास को लेकर जो भी बातें की जा रही हैं कभी-कभार उन्हें लेकर मेरे मन में संदेह रहता है. लेकिन पांच सालों में बिहार में जो बदलाव हुए हैं
, उन पर गौर करें तो विकास को लेकर यह संदेह कम होता है. इन्हीं बदलावों ने इस आशंका को भी काफ़ी हद तक गलत साबित किया कि बीमारू राज्यों में बेहतर प्रशासन के बावजूद विकास नहीं हो सकता.

कानून और सुशासन को बिना दृढ़ इच्छाशक्ति के नहीं स्थापित किया जा सकता.बिहार ने पिछले पांच सालों में जो कुछ भी हासिल किया है
,उसमें अगर सबसे बड़ी उपलब्धि खोजी जाये तो वह यही होगी कि बिहार से अपराध का खौफ़ कम हुआ है. खौफ़ का कम होना यह सवाल उठाता है कि ओखर अब तक के शासन में ऐसी कौन-सी कमजोरी थी, जिसने इस खौफ़ को कम करने की बजाये बढ़ाया ही.

आज अगर इसका जवाब खोजा जाये
, तो आसानी से कहा जा सकता है कि बेहतर शासन के भरोसे किसी भी असंवैधानिक गतिविधि पर काबू पाया जा सकता है.बिहार विचारधाराओं के सभी स्तर पर अतिवाद से घिरा है. अगर आदिवासियों और गरीब तबकों के हितों की लड़ाई के नाम पर नक्सलियों ने हिंसा फ़ैलाई तो उधर जातीय प्रभुत्व के नाम पर रणवीर सेना जैसे जातीय समूह भी पीछे नहीं रहे.

इस दौर से निकलने के लिए जिन सामंजस्य भरे कदमों की जरूरत थी
, सरकार ने उठाये और यही वजह है कि बीते उस दौर का आतंक काफ़ी हद तक कम हुआ है. अगर दूसरी सबसे बड़ी सफ़लता देखें तो इन सामंजस्य भरे कदमों ने बिहार के लोगों के मन में आत्मविश्वास भरा है. लोगों के मन में विश्वास जमा है कि बिहार में अच्छी सड़कें भी बन सकती हैं. शिक्षा व्यवस्था बेहतर हो सकती है. अस्पताल खुल सकते हैं.

यह सब हुआ और इन कदमों ने आम जनता के मन में भी शासन के प्रति उम्मीद जगाई है.तीसरे स्तर पर यह बदलाव राजनीतिक व्यवस्था में दिखाई देता है. मैं इस बदलाव को भी तीन नये स्तरों पर देखता हूं. पहला
, बिहार की राजनीति में जड़ जमा चुकी जातिगत राजनीति की बुनियाद में एक बड़ा परिवर्तन हुआ है.

अब जातिगत राजनीति के केंद्र में वे लोग हैं
, जो समाज के दबे-कुचले तबके से जुड़े थे और राजनीति की मुख्य धारा से किनारे थे. दूसरे, बेहतर राजनीति के लिए मजबूत सहभागिता की जरूरत होती है. उतनी ही जरूरत होती है पंचायती सहभागिता की. बिहार की राजनीति में इन दोनों ही स्तरों पर सकारात्मक बदलाव हुए हैं. सत्ता के केंद्र को पंचायतों की ओर मोड़ना दिखाता है कि राज्य में विकास की बयार को निचले स्तर से जोड़ने की कोशिश की जा रही है.

राजनीतिक विचारधाराओं में देखें तो राजनीति को सही दिशा में ले जाने का यह शुरुआती कदम है.वास्तव में हम इस मुगालते में रहते हैं कि विकेंद्रीकरण होना और राज्य सरकारों का मजबूत होना एक लंबी प्रक्रिया है. इसे हासिल करने में वर्षो लगते हैं. अगर बेहतर तरीके और शासन से इस दिशा में बढ़ा जाये
, तो यह मंजिल कम समय में हासिल की जा सकती है. लेकिन इससे बड़ी चुनौती इस हासिल कदम पर टिके रहना है.

भले ही मौजूदा बिहार सरकार ने सुशासन की दिशा में बेहतर काम किया है
, लेकिन असल चुनौती है इस पर टिके रहना. बिहार के लिए भी यही चुनौती होगी. लोकतंत्र में सतत बदलाव होते रहते हैं. लेकिन भारतीय संदर्भो में देखा जाये, तो किसी भी राज्य में इस तरह के सकारात्मक बदलाव दशकों बाद हुए हैं. अगर बिहार इस बदलाव पर टिका रहता है, तो यह सफ़लता और बड़ी हो जाती है.कुछ सालों से राज्य ने ऊंची विकास दर हासिल की है.

लेकिन इसके अलावा भी कई मुद्दे हैं
, जिन पर इस सरकार को आंकना चाहिए. इसमें सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा है कि बिहार सरकार ने विनिर्माण उद्योग के क्षेत्र में करीब 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हासिल की है. आंकड़ों के मुताबिक, विनिर्माण का हिस्सा राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से दोगुना हो गया है. वास्तव में जब इस क्षेत्र में विकास होता है, तो उससे होने वाले लाभ का फ़लक काफ़ी बड़ा होता है. शहर से लेकर गांवों तक के श्रमिक इसमें जुड़ते हैं.

रोजगार के कई साधन मुहैया होते हैं
. इस लिहाज से सबसे ज्यादा फ़ायदा ग्रामीण बिहार को मिला. सड़कों के बनने से उपेक्षित से पड़े गांव विकास की कतार से सीधे जुड़े गये हैं. स्थायी विकास के लिए यह बेहद जरूरी भी है. कृषि क्षेत्र में विकास को बढ़ावा मिला, लेकिन प्राकृतिक विपदाओं के चलते होने वाले नुकसान का अभी भी कोई स्थायी उपाय नहीं खोजा जा सका है.

यह तसवीर का एक पहलू है. दूसरे पहलू पर भी गौर कीजिये. आधुनिक समाज को देखते हुए हमें यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि स्थायी विकास के लिए औद्योगीकरण और सेवा क्षेत्र पर जोर देना होगा. आज भी यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता कि इस दिशा में बिहार अभी कदम बढ़ा पाया है या नहीं.

सुरक्षा की गारंटी न होने के कारण अभी निजी क्षेत्र बिहार जाने में हिचक रहा है. कुछ ऐसे आधारभूत कारण अभी अछूते हैं जिन पर बात होनी चाहिए
, लेकिन हो नहीं रही है. पहली, बिहार में आज भी बिजली एक बड़ी समस्या है. ऊर्जा की अनिश्चितता छोटे उद्योगों के लिए बड़ी समस्या पैदा करती है, जबकि छोटे उद्योग ही किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए रीढ़ की हड्डी होते हैं.

दूसरी समस्या है शहरीकरण. शहरीकरण के लिए एक निश्चित रणनीति के बिना कोई भी राज्य विकास की राह पर देर तक नहीं चल सकता. जितने भी राज्य विकास की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं सभी ने अपने शहरी क्षेत्र के विकास पर ज्यादा निवेश किया है. पश्चिम बंगाल का उदाहरण लें तो राज्य भले ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास की पैरोकारी करता हो
, पर राज्य के विकास को वास्तविक गति शहरी अर्थव्यस्था से ही मिलती है. बिहार में भी शहरीकरण हो रहा है, लेकिन जिस तरीके से हो रहा है वह स्थायी फ़ायदा देने वाला नहीं है.

एक-राजनीतिक ओर्थक सवाल यह भी है कि जिस राज्य की अर्थव्यवस्था ही ग्रामीण अर्थव्यस्था पर टिकी रही हो उसमें तेजी से ऐसे बदलाव की उम्मीद की जा सकती है
? क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि एकाएक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था औद्योगिक और सेवा क्षेत्र पर आधारित अर्थव्यवस्था में बदल जाय? अगर इस लिहाज से सोचा जाये, तो बिहार के विकास की धीमी गति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

वास्तव में नीतीश कुमार ने अपने इस कार्यकाल का उपयोग दशकों से जड़ हो चुके शासन को र्ढे पर लाने में किया है. अब प्रशासनिक संस्थाओं को और मजबूत करने की जरूरत है. लेकिन जैसा कि हमने पश्चिम बंगाल में देखा कि शहरीकरण और औद्योगीकरण की प्रक्रिया में बड़े विवाद सामने आये.

वास्तव में जमीन से जुड़ा मसला हर जगह गंभीर होता है. अगर बिहार सरकार इस दिशा में कदम उठाती है
, तो उसे भी ऐसे गभीर विवादों के लिए तैयार रहना होगा.भूमि सुधार और उसे लागू किये रहना बिहार के लिए आज सबसे जरूरी कदम होगा. इसकी जरूरत भी है.

लेकिन इस रास्ते के खतरों से भी आगाह रहना होगा. जाहिर है भूमि सुधार जैसे कदम उठाये जायेंगे तो समाज का एक बड़ा तबका आपके खिलाफ़ हो जायेगा जो अब तक उस जमीन पर कुंडली मारे बैठा था. इसका मतलब यह भी नहीं है कि ऐसे कार्यक्रमों से हाथ खींच लिए जायें.

पश्चिम बंगाल का उदाहरण लें तो वहां की वामपंथी सरकार स्थानीय लोगों को इसकी जरूरत समझाने में सफ़ल हो जाती है. लेकिन नीतीश सरकार इस मामले में स्पष्ट नहीं है कि उनकी पार्टी में इस तरह की सोशल इंजीनियरिंग का सामथ्र्य है. वे ऐसे मसलों से निपटने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं
, यह भी एक चुनौती है.

आखिर में शिक्षा की दशा पर भी बात होनी चाहिए. कुछ नये और सही कदमों के बावजूद शिक्षा के स्तर पर अभी बहुत कुछ होना बाकी है. बेहतर उच्चशिक्षा विकास का इंजन होती है. अगर विकास में बेहतरी लानी है
, तो सरकार को इस दिशा में प्रयास करने ही होंगे.

(लेखक सेंटर फ़ार पालिसी रिसर्च के प्रेसीडेंट हैं)

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