सबसे बड़ा रुपैया

सबसे बड़ा रुपैया

दुनिया में करेंसी का एक एलीट क्लब है। इसमें डालर, पाउंड, यूरो और जापानी येन शामिल हैं। इस क्लब में अब रूपये की एंट्री हो गई है। मतलब यह है कि हमारी करेंसी अब ग्लोबल ब्रांड बनने वाली है। इसका फायदा यह होगा कि जब कभी भी दुनिया के लिए डालर के अलावा किसी दूसरी करेंसी को रिजर्व करेंसी बनाने की बात होगी तो इसमें रूपया भी शामिल हो सकता है।

करेंसी के रूप में रूपये की शुरूआत शेरशाह के समय में हुई थी। उस समय जारी किए गए चांदी के सिक्के को नाम दिया गया रूपया। अठारहवीं शताब्दी में बैंक ने नोट जारी करने शुरू किए। रिजर्व बैंक ने नोट छापने का काम 1938 में शुरू किया।

लेकिन अब रूपये को नई पहचान मिली है। इस चिह्न को जारी करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि रूपये को एक पहचान मिली है और अब इसे भी दुनिया की दूसरी ग्लोबल करेंसी के साथ देखा जाने लगेगा।

पहचान तो ठीक है। देश की शान भी बढ़ेगी लेकिन क्या दुनिया वाले इसे आसानी से पचा पाएंगे? क्या रूपये को भी दुनिया की रिजर्व करेंसी के रूप में स्वीकार किया जाएगा? इसके लिए सबसे जरूरी है कि इस नए ब्रांड को मजबूत कैसे किया जाए, दुनिया में इसकी ख्याति कैसे बढ़ाई जाए?

किसी भी ब्रांड को ग्लोबल ख्याति दिलाने के लिए यह जरूरी है कि इसके मानने वालों की संख्या लगातार बढ़े। साथ ही यह भी जरूरी है कि इस ब्रांड के पीछे वाला प्रोडक्ट कितना मजबूत है। ब्रांड रूपये के पीछे है-ब्रांड इंडिया की ताकत और ब्रांड इंडिया की ख्याति लगातार बढ़ रही है।

अब शेयर बाजार को ही ले लीजिए। भारत का शेयर बाजार पिछले एक साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है और जानकार फिर से सेंसेक्स को 21,000 का आंकड़ा पार करते देख रहे हैं। लेकिन दुनिया के दूसरे बाजार एक कदम आगे बढ़कर दो कदम पीछे चले जाते हैं। अमेरिका में फिर से मंदी की बात हो रही है। यूरोप की ज्यादातर सरकारें आकंठ कर्ज में डूबी हैं। जापान पिछले पंद्रह साल से कछुए की चाल से चल रहा है।

लेकिन भारत में रफ्तार थमने का नाम ही नहीं ले रही है। जहां दूसरे देशों में अर्थव्यवस्थाओं की गाड़ी स्टार्ट करने के लिए स्टिमुलस दिए जा रहे हैं, ब्याज दरों में कटौती हो रही है, वहीं भारत में स्टिमुलस वापस लेने की बात हो रही है और रिजर्व बैंक ने पिछले चार महीने में तीन बार ब्याज दर बढ़ा दी है।

ब्रांड इंडिया की मजबूती के दावे खोखले नहीं हैं। आईएमएफ के अनुमान के मुताबिक इस साल दुनिया में विकास दर 4.25 परसेंट रहेगी। एशिया की विकास दर 7 परसेंट रहने का अनुमान है, जबकि भारत और चीन में यह दर इससे भी काफी ज्यादा रहेगी। मतलब यह है कि दुनिया में गति है तो भारत और चीन की वजह से। और यह आगे भी जारी रहेगी।

इंटरनेशनल मोनिटरी फंड की ही एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले पांच साल में दुनिया के कुल उत्पादन का एक तिहाई एशिया में ही होगा और अगले 20 साल में एशिया की जीडीपी दुनिया के 7 अमीर देशों (जिन्हें जी-7 के नाम से जाना जाता है) से बड़ी होगी।

ब्रांड इंडिया की ताकत का लोहा सभी मानने लगे हैं। यही वजह है कि हर छोटा बड़ा विदेशी निवेशक यहां निवेश करने को आतुर हो रहा है। हर दिन भारत के शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशक कई सौ करोड़ रूपये लगा रहे हैं।

लेकिन इस ब्रांड की चकाचौंध में हमें देश के दूसरे बड़े एजेंडे से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। नक्सलवाद की समस्या हमारे सामने मुंह बाए खड़ी है। देश में 130 जिले ऐसे हैं, जहां जिला मुख्यालयों के बाहर सरकारी तंत्र काम नहीं करता है। उन इलाकों में माआ॓वादियों का कब्जा है। सीआरपीएफ की ज्यादा टुकड़ियां तैयार करने भर से इस समस्या से निजात नहीं पाई जा सकती है। आक्रामक और भ्रष्ट प्रशासन से लोग इतने नाराज हैं कि माआ॓वादियों से भी उनकी सहानुभूति हो जाती है।

ऐसे में रूपये के साथ-साथ रिफॉर्म की भी हमें सख्त जरूरत है। वह रिफॉर्म है प्रशासनिक तंत्र का। यूपीए-1 के दौरान वीरप्पा मोईली की अध्यक्षता में ‘प्रशासनिक सुधार कमीशन’ बना। इस कमीशन ने 15 रिपोर्टें दीं। प्रशासन तंत्र में बदलाव के लिए कई सुझाव दिए गए। ब्यूरोक्रेसी को कैसे जिम्मेदार बनाया जाए, इस पर पूरी की पूरी रिपोर्ट दी गई लेकिन सरकारी बाबुओं की जिम्मेदारी तय करने वाली रिपोर्ट किसी सरकारी बाबू की फाइल में बंद करके रख दी गई है। क्या उन सुझावों को अमल में लाने पर किसी का ध्यान गया है?

इसके साथ ही न्यायपालिका में रिफॉर्म की बात भी कई सालों से चल रही है। उस देश की चमक कब तक बरकरार रह सकती है, जहां विभिन्न न्यायालयों में 2 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हों। कहीं ऐसा तो नहीं है कि ब्रांड तो हम बना रहे हैं लेकिन इसको मजबूत करने वाले सारे पहलुओं पर हम ठीक से ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो नए बने ब्रांड तो फीके हो ही जाएंगे, हमारे पुराने चमकते ब्रांड भी धीरे-धीरे धूमिल हो जाएंगे।

इसीलिए यह जरूरी है कि जिस रूपये के प्रतीक चिह्न के लिए हमने एक खास तरह के ‘आर’ को चुना है। उस ‘आर’ यानी रिफॉर्म की पूरी ताकत को ठीक से पहचानें। रिफॉर्म की पूरी ताकत का तभी हमें एहसास होगा। नहीं तो दूसरे पहल की तरह यह ‘आर’ भी एक और चिह्न बनकर रह जाएगा। अपने यंगिस्तान की ऊर्जा का इस्तेमाल भी तभी ठीक से होगा, जब हम ‘आर’ शब्द के सही मतलब को पहचानें।

syedasifimamkakvi@rediffmail.com

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Tags: ASIFIMAM, KAKVI, SYED

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