Prashant Kausik's Blog – March 2011 Archive (1)

मुहब्बत

अगर कुछ कहना हो , दिल्लगी में कह डालिए,

जीना हो शुकून से तो अब मुहब्बत कर डालिए.

वो काफ़िर नहीं जो नाम खुदा का नहीं लेता

काफ़िर तो वो है जो इन्कार मोहब्बत से करता है,

छोड़ के इन बंदिशों को अब ये जाम अधर से लगाइए

इक बार बस अब मुहब्बत कर डालिए



नसीब तुझे जन्नत होगी या नहीं क्या पता ;

जन्नत बनी है उसके लिए जो मुहब्बत खातिर अश्क पीता है !

खोट दिल मैं है तो लाख कोशिशे कर ले ,

तू मुखातिब न हो सकेगा उंनसे जो ये जाम पीता है,

छोड़ कर साड़ी उलझनों को अब इस जहाँ… Continue

Added by Prashant Kausik on March 26, 2011 at 12:42pm — 7 Comments

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