बिहार की होली की है अलग पहचान

पटना। वैसे तो देश में वर्षभरकई पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं, फाल्गुन मास के अंतिम दिन मनाए जाने वाले होली पर्व की अपनी अलग विशेषता है। बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होली का त्योहार सभी को अपने रंग में रंगने और विभिन्न प्रकार के गुलालों के कारण अलग छटा बिखेरता है।

बिहार में होली के मौके पर गाये जाने वाले फगुआ की अपनी गायन शैली के लिए अलग पहचान है। राज्य में कई स्थानों पर कीचड से होली खेली जाती है तो कई स्थानों पर कपडा फाड होली खेलने की भी परंपरा है।

होली के दिन रंग से सराबोर लोग ढोलक की धुन पर नृत्य करते, लोकगीत गाते हुए आनंदित होते हैं और गांव के प्रत्येक घर में पहुंच कर एक-दूसरे को रंग से सराबोर कर उन्हें अपनी महफिल में शामिल कर लेते हैं।

हिंदी संवत् के अनुसार नए वर्ष की शुरुआत होली के अगले दिन चैत महीने से होती। बुजुर्गो का कहना है कि यह पर्व आापसीसैहा‌र्द्रऔर मेल-मिलाप का पर्व है। बुजुर्गो का कहना हैं कि अगर सरल शब्दों में कहें तो दीपावली हमारे घर की सफाई का पर्व है तो होली हमारे मन की सफाई का पर्व है। वह कहते हैं कि होली का वास्तविक प्रारंभ होलिका दहन से होता है। इस मौके पर बेकार पडी लकडियों का समान इकट्ठा कर जला दिया जाता है। इससे कूडा-कर्कट भी खत्म हो जाते हैं। फिर रंग और गुलाल की धमाचौकडी शुरू हो जाती है। पुरुष, महिलाएं, बच्चे सभी मस्ती में झूमते हैं। चारों ओर गीत-संगीत और आनंद का माहौल होता है।

बिहार में होली की बात चल रही हो और भांग का जिक्र न हो, ऐसा हो नहीं सकता। होली के दिन लोग भांग का सेवन जरूर करते हैं। बिहार में बूढवाहोली मनाने की भी परंपरा है। होली के दूसरे दिन कई इलाकों में लोग बुढवाहोली खेलते हैं। इस दिन लोगों की मस्ती दोगुनी होती है।

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kya baat hai. lagta hai ki aap holi ke rang mei rang gaye. 

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